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इन ख्वाहिशों से कह दो कहीं और जा बसें...

जनवरी का आख़िरी सप्ताह है , गुलाबी ठण्ड है और   मैं भदैनी घाट की सीढ़ियों पर बैठी हुई हूँ.   गंगा किनारे घाट की सीढ़ियों पर बैठना मुझे तब से ही बहुत पसंद रहा है जब मैं पहली बार बनारस आई थी. युनिवर्सिटी आने के बाद तो   मेरी कितनी ही शामें   अस्सी   पर बीती हैं. सर्दी की गुनगुनी धूप हो , डायरी हो , कलम हो , गंगा का किनारा हो , बनारस में इससे ज़्यादा और क्या चाहिए.   घाट की जिस सीढ़ी पर अभी मेरे पाँव हैं उससे अगली सीढ़ी पानी में डूबी हुई है. माफ़ी चाहती हूँ पानी में नहीं , ' गंगाजल ' में. गंगाजल , जिसे   स्पर्श   कर लोग जीवन चक्र से मुक्त हो जाने की आकांक्षा रखते हैं. सचमुच जादू होता है न स्पर्श में !! सोच रही हूँ कि मैं भी छू पाती गंगा को. मुझे मुक्ति की कोई आकांक्षा नहीं है. मैं कुछ   चाह रही हूँ तो बस इतना ही कि एक सीढ़ी और नीचे उतर कर अपने पाँव  ' गंगाजल ' में डुबा कर प्रकृति के कोमल स्पर्श का जादू कुछ देर महसूस कर सकूँ. पर मैं ऐसा नहीं कर पा रही हूँ.   माना कि मैं विवश हूँ और एक सीढ़ी नीचे उतर कर अपने पाँव गंगाजल में नहीं डुबा सकती...

रविवार या सन्डे...?

 आज रविवार है. रविवार ! सुन के कुछ जाना पहचाना सा लग रहा है न ये शब्द. हाँ सन्डे और मंडे वाली जीवन शैली में रविवार जैसे  रास्ता भटक कर कहीं खो गया है. और नहीं तो क्या. पहले रविवार माने होता था स्कूल की छुट्टी होने पर भी सुबह सुबह उठ जाना. पापाजी का ऑफिस न जाना. रविवार का मतलब होता था रंगोली और श्री कृष्णा और आर्यमान. रविवार का मतलब होता था सुबह की धूप का खिड़की से कमरे तक आना. हाँ, क्यूंकि बाकी दिनों इस धूप को कमरे तक आते देखने के लिए हम घर में कहाँ रुक पाते थे, स्कूल जो जाना होता था. रविवार का मतलब होता था रूटीन से अलग स्पेशल खाना. और हाँ मेरे लिए रविवार का एक और बहुत खास मतलब होता था. और वो था दैनिक समाचार पत्र का रविवासरीय अंक, जिसके लिए हम भाई बहन आपस में खींचतान करते थे. किसी को उसमें कहानी पढनी होती थी, किसी को राशिफल. किसी को हेनरी पढना होता था तो किसी को वर्ग पहेली सबसे पहले हल कर के सबसे बुद्धिमान होने का ख़िताब पाना होता था. पांचवीं क्लास के बाद उस तरह का रविवार आना बहुत कम हो गया. हम बोर्डिंग में रहने जो चले गए. हम यानि मैं और दीपिका, मेरी बहन. हाँ घर पर वो रविवार ...

आज़ ये क़ायनात और होती

उनकी आँखों में लाख नगमे हों लब जो हिलते तो बात और होती लाख तारे हों शब के दामन में चाँद दिखता तो रात और होती इश्क बस फ़लसफ़ा न होता तो आज़ ये क़ायनात और होती हर एक चेहरे में तुम नज़र आते उफ़ ये आदम की ज़ात और होती

यह कैसी 'एलकैमी ऑफ़ डिज़ायर'...?

बहुत सारे विचार, बहुत सारी आवाजें एक साथ उमड़ घुमड़ रही हैं मन में जैसे प्रेशर कुकर में पकती खिचड़ी में दाल और चावल. शुतुरमुर्ग की तरह आँख बंद कर लेने का भी सहारा नहीं. शब्दों से बनी तस्वीर को ना तो किसी रौशनी की ही ज़रुरत और न ही ऑप्टिकल नर्व की . एक तरफ़ से आवाज़ आ रही है 'सेक्स इज़ नॉट द ग्रेटेस्ट ग्लू बिटविन टू पीपल, लव इज़'. दुसरे कोने में कोई सधी हुई आवाज़ में कह रहा है ' अ बैड लैप्स ऑफ़ जजमेंट एंड एन औफ़ुल रीडिंग ऑफ़ द सिटुएशन हैड लेड टू एन अनफॉरचुनेट इंसिडेंट'. एक आवाज़ और भी है, पॉवर, पैसे और नाम के नशे में चूर 'दिस इज़ दी इज़ीएस्ट वे फॉर यू टू कीप द जॉब..'और आख़िर में एक गंभीर महानता का आवरण ओढ़े एक और आवाज़ ' आई हैव आलरेडी अनकंडीशनली अपोलोजाइज्ड फॉर माय मिसकंडक्ट टू द कंसर्नड जर्नलिस्ट, बट आई फील टू एटोन फरदर' उफ़्फ़ सर चकरा रहा है मेरा... किस आवाज़ को सच मानूं. एक तरफ़  हैं एलकैमी ऑफ़ डिज़ायर जैसी किताब के लेखक, तहलका जैसी अवार्ड विनिंग पत्रिका के मुख्य संपादक तरुण तेजपाल और दूसरी तरफ है एक ऐसा आदमी जो अपने ऑफिस में काम करने वाली लड़की पर यौन उत्पीड़न का प्रय...

परवाना ही क्यूँ जल जाये

शमां से रौशन सारी महफ़िल फिर ये किस्सा समझ ना आये परवाना ही क्यूँ जल जाये तोल रवायत के पलड़े पर जात के दीन के सिक्कों से जिसने चाहा खुद को भुला के उसको कैसे कोई भुलाये दीवाना ही क्यूँ जल जाये किस्सागो दुनिया की फ़ितरत बदली है न बदलेगी एक कहानी लिखे एक लिखने से पहले ही मिट जाये अफ़साना ही क्यूँ जल जाये

तुझ में बसी है मेरी जान...

बचपन की कहानियां कभी जेहन से नहीं उतरतीं. किसी न किसी बहाने याद आ ही जाती हैं. या कहें कि बड़े बुज़ुर्ग कहानियों की शक्ल में अपने अनुभव छोड़ जाते हैं नई पीढ़ी के लिए जो गाहे बगाहे काम आते रहते हैं. इस वक़्त जो कहानी याद आ रही है वो है उस जादूगर की जो अपनी जान को तोते में छुपा के रखता था. जान तोते में हो तो फिर जादूगर को किस बात का डर, कोई भी उसे मार नहीं सकता था. उस वक़्त कहानी सुन के लगता था कि काश हमें भी जादू आता तो हम भी अपनी जान किसी डॉल या टेडी में छुपा देते. कुछ और बड़े हुए तो इस कांसेप्ट पे हँसी आने लगी. पर अब लगता है कि वो सिर्फ कहानी नहीं थी. सचमुच ही हम सब उस जादूगर जैसे होते हैं. हमें कोई न कोई चाहिए होता है अपनी जान छुपाने के लिए. जाने क्यूँ खुद में अपनी जान रखना इतना मुश्किल हो जाता है. कोई अपनी जान अपने बच्चे में छुपाता है तो कोई अपनी प्रेमिका में. किसी की जान कुर्सी में होती है तो किसी की बैंक की तिजोरियों में. आज फेसबुक के पन्ने पलटते हुए देखा कि सबसे ज़्यादा लोगों की जान आज सचिन रमेश तेंदुलकर में अटकी हुई थी. मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था. आजकल तो जैसे एक ट्रेंड सा ...

अपनी जान किसी के नाम...

ख़ाली काग़ज़ भी साफ़ दिल जैसा होता है जिस पर लिख सकते हैं अपनी जान किसी के नाम... -अमृता प्रीतम किसी के प्यार में लिखे हुए ख़त कितने ख़ूबसूरत हो सकते हैं ये मैंने ‘ख़तों का सफरनामा' पढ़ते हुए महसूस किया. अमृता और इमरोज़ के ख़त एक दूसरे के नाम. प्यार की चाशनी में डूबे, हज़ार दर्द, शिक़वे-शिक़ायतें समेटने के बावज़ूद इतने दिलक़श कि उफ़!! ख़ूबसूरती शायद अधूरे होने में ही है. पूरा होना तो जैसे ख़त्म हो जाना है, फ़िल्म के दी एंड की तरह. अधूरापन ही तो है इन ख़तों में जो दोनों को पूरा कर रहा है. अपनी बात कह पाने की ख्वाहिश, उसकी बात सुन पाने की आरज़ू. दोनों के पूरा होने के सुकून की उम्मीद. ये सुनने का इंतजार कि कोई उसकी याद को ज़िन्दगी की तरह जी रहा है और ये कहने की बेक़रारी भी कि तुम जीते रहोगे तो मैं भी ज़िन्दा हूँ. अपने हर ख़याल को काग़ज़ पर उकेर देने की तड़प, पानी में डूबते वक़्त सांस ले पाने की तड़प से ज़रा भी कमतर नहीं दिखती.  दुनिया के किसी भी कोने में, कितनी भी नेमतों के बीच दिल से अगर जाता नहीं तो बस एक ख्याल... ‘तुम कहाँ हो? कैसे हो? क्या कर रहे हो?’ बस एक चुपचाप सी ख्वाहिश... ‘काश...