एहसास के पंछी

उन हाथों की
सुलगती हुई नर्मी का
नम होता एहसास
आज भी है
कहीं क़ैद
वक़्त के पुराने पिंजरे में
जिन हाथों ने
ढका था कभी
ठण्ड से कंपकंपाते
मेरे कमज़ोर हाथों को

जाने क्यूँ
खुलते ही नहीं
लम्हों के ये ताले
कितना भी चाहो
आज़ाद नहीं होते
एहसास के ये पंछी

छुपा देती हूँ इन्हें
पिंजरे के साथ
दूर कहीं
नज़र अन्दाज़ियों के जंगल में
 और में देखती हूँ
कि मेरे हाथ
अब कमज़ोर नहीं

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